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‘इतने टची क्यों हो रहे हैं, नेता और जजों की चमड़ी तो मोटी हो जाती है’, शशि थरूर की शिवलिंग पर बिच्छू टिप्पणी को लेकर बोला सुप्रीम कोर्ट

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी परशिवलिंग पर बिच्छू’ वाली टिप्पणी को लेकर मानहानि मुकदमे का सामना कर रहे कांग्रेस सांसद शशि थरूर को बड़ी राहत मिली है. सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ दायर मानहानि के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट की कार्यवाही पर लगी रोक की अवधि शुक्रवार (1 अगस्त, 2025) को आगे बढ़ा दी है. कोर्ट ने रोक बढ़ाते हुए शिकायतकर्ता को मानहानि का मामला खत्म करने की सलाह दी और कहा कि आप इतने भावुक क्यों हो रहे हैं. जजों और नेताओं की चमड़ी मोटी हो जाती है.

साल 2018 में शशि थरूर ने बेंगलुरु में लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान यह टिप्पणी की थी. उन्होंने कहा था कि आरएसएस के ही एक नेता ने पीएम मोदी की तुलना शिवलिंग पर बैठे बिच्छू से की थी. उनके इस बयान पर विवाद खड़ा हो गया और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेता राजीव बब्बर ने शशि थरूर के खिलाफ शिकायत दर्ज करा दी. अब शशि थरूर का कहना है कि यह बयान उनका नहीं है बल्कि आरएसएस के ही एक नेता का है, उन्होंने सिर्फ उनकी बात को दोहराया है. जस्टिस एम एम सुंदरेश और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने शशि थरूर के वकील के अनुरोध पर मामले की सुनवाई स्थगित कर दी.

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार राजीव बब्बर की ओर से पेश हुए वकील ने मुख्य कार्यवाही दिवस पर सुनवाई की मांग की. इसके बाद कोर्ट ने सुनवाई के लिए 15 सितंबर की तारीख निर्धारित कर दी. सुनवाई की तारीख तय करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, क्या विशेष कार्यवाही दिवस? आप इस सब को लेकर इतने भावुक क्यों हैं? चलिए, इसे बंद कर देते हैं. इस तरह तो नेता और जज एक ही ग्रुप मेंजाते हैं और उनकी चमड़ी मोटी हो जाती है

शशि थरूर ने दिल्ली हाईकोर्ट के 29 अगस्त, 2024 के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था. हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ मानहानि की कार्यवाही को रद्द करने से इनकार करते हुए उन्हें 10 सितंबर को निचली अदालत में पेश होने को कहा था. शशि थरूर के वकील ने पहले तर्क दिया था कि न तो शिकायतकर्ता और न ही राजनीतिक दल के सदस्यों को पीड़ित पक्ष कहा जा सकता है.

वकील ने यह भी कहा कि शशि थरूर की टिप्पणी मानहानि कानून के छूट वाले खंड के तहत संरक्षित है, जो यह निर्धारित करता है कि सद्भावना से दिया गया कोई भी बयान आपराधिक नहीं है. इसमें कहा गया कि शशि थरूर ने छह साल पहले कारवां पत्रिका में प्रकाशित एक लेख का संदर्भ मात्र दिया था.

सुप्रीम कोर्ट ने भी हैरानी जताई थी कि 2012 में, जब लेख मूल रूप से प्रकाशित हुआ था, तब बयान को मानहानिकारक नहीं माना गया था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, आखिरकार, यह एक रूपक है. मैंने समझने की कोशिश की है. यह उस व्यक्ति की अपराजेयता को दर्शाता है जिसका जिक्र किया गया है. मुझे नहीं पता कि किसी ने इस पर आपत्ति क्यों जताई है.’

शशि थरूर के खिलाफ कार्यवाही रद्द करने से इनकार करते हुए, हाईकोर्ट ने कहा था कि प्रथम दृष्टया, प्रधानमंत्री के खिलाफ ‘शिवलिंग पर बिच्छू’ जैसे आरोप घृणित और निंदनीय हैं. कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया, इस टिप्पणी ने प्रधानमंत्री, बीजेपी के साथ-साथ उसके पदाधिकारियों और सदस्यों की मानहानि की है.

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष थरूर को भारतीय दंड संहिता की धारा 500 (मानहानि के लिए सजा) के तहत तलब करने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद है. शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि कांग्रेस नेता की टिप्पणी से उनकी धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं.

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